Wednesday, 23 December 2015

आजाद परिंदा

बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,
उडूं वहां तक,जहाँ तलाक हो,
कल्पनाओ का गगन,
बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,
बंद आँखों से देखे बहुत है,
देखे नींदों में सुन्दर स्वप्न ,
खुली आँखों से अब देखता जाऊ,
कठिन डगर पे ,न घबराऊ,
अब कुछ ऐसा करू जतन,
बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,
​भूल जाऊं वो बीती बातें,
याद रखु ,बस दुःख की रातें,
कैसे कटे,वो दुःख भरे दिन ,
बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,​
ठण्ड  ठिठुरती , वो सर्द रातें ,
अपने भी साथ कब तक दे पाते,
रोम -रोम में डर बैठा,
आखिर,बना मिटटी तन,
बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,
भर आई अब काली रातें ,
सुदृढ नहीं वो , खोखली बातें,
जाने,कब निकलेगा कोई चाँद ओजस का,
जो कर दे अमावस को पूनम,​ 
बन #_आज़ाद_परिंदा 
आज उड़ना चाह रहा है मेरा मन,
- नवीन श्रोत्रिय (आज़ाद परिंदा )
     श्रोत्रिय निवास बयाना 

Thursday, 10 December 2015

ग़ज़ल


ग़ज़लें वो नहीं जो सिर्फ महफ़िल थाम लेती है

ग़ज़लें वो भी नहीं, जो गम को उफान देती है

ग़ज़लें वो है,जिनसे प्यार झलकता है,वफ़ा महकती है
ग़ज़लें वो है जिनमे किस्सा-ऐ-दोस्ती है,

ग़ज़लें दिलजले का दिल जलाती है,
जला है,जिनकी की यादों में,
उस शख्स को,ग़ज़ल याद दिलाती है,
थाम लेता ये #शर्मा सांसे अपनी,
गर ग़ज़लें इसने सुनी न होती ,
मिट जाती मोहब्बत इस दुनियां से,
गर दुनियां में ग़ज़ल-ऐ -बेवफा न होती,
सूख जाते ये #_सुर्ख_गुलाबी_लव,
गर ग़ज़लों ने इनपे लाली डाली न होती,
कहे दिलबरो और दिलजलों को शर्मा,
मुस्कराते रहो,मुस्कान कभी टूटने न पाये,
जान जाए तो जाए,मोहब्बत का दमन कभी छूटने न पाये,
मोहब्बत हर किसी को अपना बना लेती है,
वो मोहब्बत ही है यारो जो हर दर्द की दवा होती है। 
- नवीन श्रोत्रिय
श्रोत्रिय निवास बयाना

UTKARSH KAVITAWALI
GAZAL POETRY
Aproved By : Mr.Naveen Shrotriya

मेरे यार

ऐ यार मेरे तेरी तारीफ में मैं क्या कहूँ,
चाँद चाँद है चाहे पूनम का हो या अमावस का ,
तेरा नूर उसी तरह से फैला है मेरी जिंदगी में,
जैसे अन्धेरे को चीरती हुई कोई सूरज की रोशनी,
जिसके आगोश् में समस्त वातावरण रोशन हो तमहीन हो जाता है ।
शुभप्रभात जय श्री कृष्ण
-नवीन श्रोत्रिय
श्रोत्रिय निवास बयाना

मैं हिन्दू

मैं हिन्दू हूँ ! तुम भी तो हिन्दू हो ,
तुम्हारी मेरी सोच का ,
फिर क्यों न एक बिंदु हो,
इस ज़माने में मैं भी तो रहता हूँ,
अपने धर्म का मैं भी तो पालन करता हूँ,
तुम करके जीव रक्षा, इंसान सिद्द हो।
तुम्हारी मेरी सोच का ,
फिर क्यों न एक बिंदु हो,
फैला दो तुम यश अपना,
उस तम के पार तक,
लहरा दो ध्वज कीर्ति,
तुम जगत जीव सार तक,
लड़ते रहो तुम,अपनी अंतिम साँस तक,
बढ़ा लो तुम जोश, अपने हरेक वार तक,
खाओ कसम तुम,विश्व विजयमान की,
शान न जाने पाये, अपने प्यारे हिन्दुस्तान की,
करो तुम रक्षा,लगा बाज़ी अपनी जान की ,
हे ! हिन्दू पुत्र तू वीर है,ये बात अभिमान की,
झुकना न सीखा तुमने,चाहे शीश कटाना पड़े,
दूसरे का छीनना नहीं, चाहे अपना घटना पड़े,
डरता नहीं तू , चाहे दुश्मन इर्द-गिर्द हो,
खुशियों का उमड़े सैलाब,
आँखों के ख़ुशी का इंदु हो,
तुम्हारी मेरी सोच का ,
फिर क्यों न एक बिंदु हो,
मैं हिन्दू 
हूँ ! तुम भी तो हिन्दू हो ,
तुम्हारी मेरी सोच का ,
फिर क्यों न एक बिंदु हो,

-
नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
श्रोत्रिय निवास बयाना

Thursday, 3 December 2015

मेरा मित्र


वो चाँद से ज्यादा शीतल है,

है चांदनी से ज्यादा प्यारा,
मोल में उसका जानू न,
है वो अनमोल सितारा ,
दुःख बाँट लेता मेरे सारे,
भूल अपना दर्द सारा,
कुछ तो पुण्य किये है मैंने,
जो मुझे मिले है ऐसे ‪#‎यारा‬
" मेरे उन प्यारे मित्रो को समर्पित,जो मेरे सुख दुःख में साथ रहे "
‪#‎नवीन_श्रोत्रिय‬ (आज़ाद परिंदा)


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नाम : नवीन शर्मा श्रोत्रिय
उपनाम : उत्कर्ष
पिता : श्री रमेश चंद शर्मा
माता : श्रीमति ललिता शर्मा
जन्म : 10 मई 1991
जन्म स्थान : ग्राम - नरहरपुर,तहसील- वैर,जिला - भरतपुर (राज•) 321408
वर्तमान निवास : उपखण्ड - बयाना,जिला भरतपुर (राजस्थान) 321401
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी)
सीनियर अकाउंटेंट
लेखन : गद्य-पद्य दोनों में (छंद, गीत,गजल,निबंध,कहानी,लघुकथा)
लेखन : लगभग 26 जून 2016 से
उपलब्धि : आपकी रचनाये अलग अलग राज्यो से कई पत्रिकाओं में प्रकाशित,
काव्य मंच : 1. उज्जैन, 2. अपनाघर आश्रम, 3. बयाना

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