Saturday, 6 July 2019

Krishna Bhajan कृष्ण भजन

कृष्ण भजन Krishna Bhajan
उनसों  का  प्रीत  रखें, जिन प्रीत  काम की
करनी तो  उनते,करें, मुक्ति भव  धाम की
घर ते  चले जो आज, मिलवै  भगवान  ते
उनकूं  न   ढूँढे   मिले, साँची     ईमान   ते

कान्हा कूँ सब जग खोजत है, कान्हा   कहूँ   न  पावैगौ
कान्हा ते तो मिलन  तभै जब, जग  में   प्रेम  लुटावैगौ

भक्ति  भाव  बिन  धार  लई  है, कर मे  तुलसी  माला
कंठी    पहरी      और     गेरुआ, ओढा    लाल   दुशाला
जगत दिखाई कूँ बने संत मुनि, केवल स्वादु कहावैगौ
कान्हा ते  तौ  मिलन तभै  जब, जग में  प्रेम लुटावैगौ

कान्हा कूँ सब जग खोजत है...

भजन करै बिन  श्रद्धा  के ही, मन मे कटुता  द्वेष पलै
लाख  रखौ  उपवास  भले ही, भव  सागर  ते  नाय तरै
दरश   करावै   गिरधर   बाकूँ, सूर  समान   रिझावैगौ
कान्हा ते तौ  मिलन तभै जब, जग  में  प्रेम  लुटावैगौ

कान्हा कूँ सब जग खोजत है...

माया   के  मोहन  में  मोहित, मनमोहन    भूल   गया
भरी जवानी  धन   कूँ  सौंपी, भव बंधन  में  झूल गया
पार    उतारै     नागरिया, जो, मीरा    जैसौ    चाह्वेगौ
कान्हा ते तौ मिलन तभै जब, जग  में   प्रेम  लुटावैगौ
कान्हा कूँ सब जग खोजत है..
Utkarsh Kavitawali
Kanha Koon Sab Jag Khojat hai.

Saturday, 15 June 2019

Top Romatic Shayari-Muktak

MUKTAK

चलाये   बाण    नैनों   के, बना  उनका  निशाना दिल 
चढ़ी फिर आशिकी हमपे, लगें  उजड़ी सभी महफ़िल 
नहीं  है  और कुछ चाहत, बने   वो    ही   में'री दुल्हन 
बने  वो  ही  दुल्हन   मेरी,रही जो  आज  की कातिल

तुम्हारी    आरजू   गर  ये, तुम्हे  अपना   बना    लूँगा

नजर  में  एक तुम  होंगी, नयन  में   यूँ   बसा   लूँगा
नहीं   मालूम    ये  सजनी, किसी की चाह थी कितनी
मगर  इतना समझ लेना, पलक   पर  मैं  बिठा लूँगा

चलों   करलें   प्रिया  परिणय, जुदाई   को  न सहना है
वचन  ले  सात   जन्मों का, हमें   अब   साथ रहना है
वरण जग  रीति   से  करके, मिलन होगा  हमारा तब
बने   हम    एक    दूजे  को, जमाने   से   ये  कहना है

करो    हरि  का  भजन  तुम  नित्य मेरे साथ में यारो

भले   हम   हों  अँधेरे   में,मगर  औरों  को मिल तारो
नहीं   है   उम्र  कोई  राधिका   माधव  को   जपने की
जपा   मेरी   तरह   जो   पाओगे, जसलीन  सी  पारो

बिना  विचारे   कर्म  करें  जो, वह   पीछे    पछताते हैं
ऐसा   मैंने    कहा  नहीं   पर, ऐसा     सभी   बताते हैं
धीरज  धारण करने की  भी, तो   कुछ  सीमा होती है
इस  धीरज  की आड़  लिये, वे केवल  समय गँवाते है

कर्म करोगे  तो  निश्चित ही, फल को तुम पा जाओगे

बिना  कर्म  के  बोलो  कैसे, तुम  अधिकार जताओगे
कर्म  बड़ा है  सदा भाग्य से, मन में  इतना  भर  लेना
मनचाही  मंजिल तुम मित्रो, एक   इसी   से  वर लेना

कोई   शिकवा  शिकायत हो,खबर इसकी हमें करना

हमें   मालूम   कब  उलझन,मगर  पर पीर को हरना
रहेगा    वक्त    न    ऐसा,छटेंगे  दुःख  के  ये  बादल
समुंदर    जो   ये  यादों   का,नही  तुम  देखकर डरना

रहा   ये    पल   बड़ा   दुर्लभ, रहा बचपन बड़ा प्यारा

नहीं    शिकवे   गिले  कोई, नहीं   मन  हार  से  हारा
कहाँ   डर   है  बसा  उर  में, कहाँ  मनलोभ पनपा है
मिले   है  मीत  मन  से  मन,मिले  है प्यार  से यारा

लिखूँ  क्या गीत गजलें छंद जब मनमीत  रूठा  हो

कहाँ   आराम   नैनो   को  जहाँ  हर स्वप्न झूठा हो
सदा   दिल  जोड़ने  में  ही  उमर  अपनी  बिताई है
कहो  कैसे  सहेगा   दिल  किसी  को  जोड़  टूटा हो

हम   टूट  से  गये  सजना   आप  जोड़िये

यूँ  बेवजह  कभी   हम  से मुँह  न मोड़िये
इन दूरियाँ  को  खत्म  करो भूल मानकर
जो  कल गुजर गया उसको आज छोड़िये

कभी   मेरी   तुमसे   मुलाकात    होगी

नैन   से    नैनों  की  अगर  बात   होगी
फिजा महक उठेंगी उस दिन सावन सी
प्रेम  से  प्रेम   की  तब   बरसात  होगी

मुक्तक [बह्र : 221 212 2,2 212 122]


है  इश्क  नाम  क्या  ये,बिन बूझ ठँस गए हैं

हो   दर्द   लाख   हमको, हम देख  हँस गए है
लेकर   हमें  कहाँ   से, देखो  कहाँ    है'  लाई
कर  प्रेम   बेवफा   से, हम यार  फँस गए है

देखकर    झूठ  को सत्य    झुकने लगा

है सही  क्या  गलत  सार   छुपने लगा
धन जगत की निगाहों में' रम  सा गया
बाद  रिश्तों   का दम  आप  घुटने लगा

जहाँ    पर   प्रीत   बसती  है, जहाँ    सद्भाव  धारा है

जहाँ  अपनत्व  कण कण में,जहाँ सबको  सहारा है
जहाँ    पर   शूर  है   जन्मे, जहाँ  की  रज भभूती है
जगत   में  पूज्य,  जगप्रिय,वतन  भारत  हमारा है


पिता पाटन  सदा गृह के,प्रसू आधार  है  मित्रो 
सुता गृह  मान बेटा वंश का उजियार  है  मित्रो 
बने दीवाल रिश्तों की,हुआ निर्माण तब घर का 
जहाँ हो मेल इन सबका,वही  परिवार  है मित्रो 

लबों  को    चूमकर   तेरे, लुटा   दूँ   प्रीत मैं अपनी
बनाकर हमसफ़र अपना, दिखा दूँ जीत मैं अपनी
नहीं  है   खेल   ये   कोई, मुहब्बत   की फतह है ये
दिवानों  को   दिखा  दूँगा, दिवानी  रीत  मैं अपनी

- नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
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All Hindi Litrature Chhand
Utkarsh Chhandawali

Sunday, 9 June 2019

Muktak : मुक्तक

जीव  के  कर्म  पर  जीव  का   अवतरण
जीव   ऊपर    चढ़ा    मृत्तिका   आवरण
कर्म    ऐसे    करो   मानवी     तन  मिले
सद्गुणों  का  करो, सबहि  अब अनुशरण
Muktak Utkarsh kavitawali
Muktak : Utkarsh Kavitawali

गर्मी पर कुण्डलिया

गरमी

गरमी   ते  गरमी  मिली, गरम  रह्यो फिर आज
गरमी  ते  गरमी   घटी, कैसौ     गरम    रिवाज
कैसौ    गरम    रिवाज, ठंड     पे   बहुतै  भारी 
हुये     अधमरे   आज, गरमी    है   अत्याचारी 
सुनौ   सखा   उत्कर्ष, रखौ   रसना   में  नरमी 
वरना      उल्टे     हाथ, परे   तुमकू   ई  गरमी
   
   नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
  श्रोत्रिय निवास बयाना
उत्कर्ष कवितावली
गरमी /Summer

प्रेम क्या है ? What Is The Love

किसी ने पूछा प्रेम क्या है ? तब मेरे अंतःकरण से जो जवाब बन पड़ा वह आपके समक्ष रखता हूँ  प्रेम आत्मा का राग है, चित्त का अनुराग  है, रिश्तों का भाग है वैरागी का वैराग है, भक्ति  की लाग है, अर्थात  प्रेम आत्मा का वह भाव, वह सम्प्रेषण  का  माध्यम  है, जो  दूर  से  ही  जीव  का  जीव  से  मिलन  करा  देता  है, वह  अहसास  है जो एक चट्टान  में  भी  प्रभु  का  साक्षात्कार  करा  देता  है, प्रेम    वह हथियार है जो  बड़े  से बड़े  दुश्मन को पल में  मात दे सकता है, वह ज्ञान है जो  भक्त  को  भगवान  से  मिला  देता  है, वह मनोभाव  है  जो  हमें  जीवन  जीना  सिखलाता  है । प्रेम वह हलाहल  है  जो  कालकूट से भी ज्यादा प्रभावशाली है, "प्रेम" प्रेम है  मगर इसके जैसा अन्य कोई नहीं यह अद्वितीय है |
उत्कर्ष कवितावली
प्रेम क्या है ? What is the love

Ghnakshari Chhand

 Ghnakshari Chhand 
जाति -पाँति धर्म नहीं, काम भेड़ियों की कोई
ऐसे  भेड़ियों  को अब, मिल     मार   डालिये

सामाजिक  सौहार्द को, कमजोरी  मान   रहे
ऐसे शन्तिदूतों को भी, घर   से    निकालिये

करते  वे   नित  पाप, क्षमा  दान  देते   आप
दानवीर   बनके    यूँ, संकट    न      टालिये

दूध  पिलाने   का  जो  शौक है चढ़ा हुआ तो
श्वानों को पिलाओ पर, साँप  मत    पालिये
उत्कर्ष कवितावली
घनाक्षरी छन्द

Saturday, 8 June 2019

मनहरण कवित्त [घनाक्षरी छंद] Manharan Kavitt [Ghnakshari Chhand ]

 Manharan Kavitt Chhnad 

घनाक्षरी छंद : मनहरण कवित्त


रावण  के  जैसा कृत्य, करते   है  आज   वही
जिनको  है भान नहीं, राम    के    प्रताप  का

रोम  रोम  उनका तो, काम,  लोभ  जपता है
मोह   परिपूर्ण   होके, नाश     करें    आपका

भूल    बैठे  रावण ने, पाया देखो  विष्णुलोक
स्वयं संग  उद्धार तो, किया  पूरी   खांप   का

रावण  के  जैसा बुद्धि, जीवी कहो कौन भला
दोनों के बुरे  हैं  कर्म, रहा   फर्क    नाप   का
Ravan or Aaj ka ravan
घनाक्षरी छंद मनहरण कवित्त

Thursday, 30 May 2019

Chalte Chalte keh Bhi Do [Geet]


गीत : चलते चलते

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चलते  चलते  कह  भी  दो, तुम  प्यार करते हो-२
हां  प्यार  करते  हो, सजन, तुम  प्यार   करते  हो
चलते  चलते  कह   भी दो, तुम   प्यार  करते  हो


देखा  जब  से  रूप  तुम्हारा, नजरो  पे छाये  तुम

राह  निहारू,  तुम्हे   पुकारू, पर  नही  आये  तुम
कैसे  बताऊ  कितना  तुम, बेकरार  करते    हो-२
चलते   चलते  कह  भी  दो, तुम  प्यार  करते हो,
हां हमसे प्यार करते हो,

हर तरफ तेरा ही जलवा, फुर्सत से तुझे संवारा है,

होगा नही तेरे जैसा कोई, चाँद सा रूप तुम्हारा है,

नैन  कटारी लेकर साजन, दिल पे वार करते हो,

हां प्यार  करते हो.......चलते  चलते कह भी दो,
तुम   प्यार  करते   हो, हां हमसे प्यार करते हो,

चलते   चलते  कह भी  दो, तुम प्यार करते हो,

नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष 
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Utkarsh Kavitawali
Utkarsh Kavitawali

सुखेलक छंद : SUKHELAK CHHAND

सुखेलक छंद :  SUKHELAK CHHAND

सुखेलक छंद विधान :- 
नगण,जगण,भगण,जगण,रगण, 7/8= 15 वर्ण


जग  सब भूल के,अब  बुलाय राधिका
सुध बुध खो बनी,सजन देख साधिका
दरस  करा   मुझे,अब  सुजान  साँवरे
हृदय  जला   रही,जगत  मोह  छाँव रे
Utkarsh Kavitawali
Sukhelak Chhnd Ka Vidhan Or Udaharan


Sunday, 26 May 2019

चौपई/जयकारी छंद [ Chaupai-jaikari chand ]

चौपई/जयकारी छंद [ Chaupai-jaikari chand ]
चौपई या जयकरी (15 मात्रा, अंत में 21 या गाल अनिवार्य, कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत चौपाई के चरण मे अंतिम एक मात्रा को कम कर देने से चौपई या जयकरी छंद का चरण बन जाता है। स्मरण रखने के लिए संक्षेप में - चौपाई - अंतिम एक मात्रा = चौपई या जयकरी ,चरण के प्रारम्भ में क्रमागत द्विकल+त्रिकल+त्रिकल नहीं आना चाहिए, अन्यथा लय बदल जाएगी।  

शुक्ल  पक्ष  औ भादो मास
आठे  कूँ  सब   धरे  उपास
जन्मदिवस राधा को खास
जाके हृदय कृष्ण  को वास

-- श्री राधे --
राधा  को   बरसानो  गाम
कृष्ण नाम को पीनो जाम
जपती  वू  तो  आठो याम
तभी हुआ पावन बृजधाम

-- श्री राधे --
कृष्णा  में  राधा को  वास
राधाऊ  कृष्णा  की  खास
इक दूजे की  बनके  साँस
रक्खे   देखो   ये  उपवास

-- श्री राधे --
चले कृष्ण धर नृप को भेष
मथुरा  के  बन  गए  नरेश
छोड़   छाड़   नंदगांव  शेष
ज्यो तप कूँ कैलाश  महेश

-- श्री राधे --
नवीन श्रोत्रिय"उत्कर्ष"
चौपई/जयकारी छंद [ Chaupai-jaikari chand ]
चौपई/जयकारी छंद [ Chaupai-jaikari chand ]


हाल जैसे रहें,मुस्कराते रहो गजल : Haal Jaise Rahe Muskrate Raho Gazal

गजल : हाल जैसे रहें,मुस्कराते रहो 

Gazal : Haal Jaise Rahe Muskrate Raho

 212-212-212-212[फाइलुन×4] 
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हाल   जैसे      रहें,   मुस्कराते     रहो
अश्क   हैं    कीमती, मत  गिराते  रहो
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हँस  रहे  लोग  सब, आज  हालात   पे
प्रेम   की   राह   है, सब   भुलाते   रहो
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बेवफा  वो  नही, वक़्त   दुश्मन   बना
आँधियो    से  यहाँ, सब   छुपाते  रहो
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ढाल खुद को,हकीकत  की  बुनियाद पे
आशियाँ   साँच   का  फिर  बनाते रहो
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प्रेम  है चीज क्या, ऐ ! “सुमन” तू बता
टूट  कर,  दो  दिलो   को  मिलाते  रहो
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नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
utkarsh Kavitawali
हाल जैसे रहें,मुस्कराते रहो : गजल 



Thursday, 23 May 2019

दानवीर कर्ण Daanveer Karn ]

गाथा : दानवीर कर्ण की (आधार छंद : आल्हा)Gatha Daanveer Karn Ki (Aalha Chhand)


दानवीर ,  कुंती   का    बेटा,  कर्ण   नाम    जिसकी   पहचान
कथा  सुनाऊँ  आज  उसी  की , श्रोताओ    तुम   देना  ध्यान

शूरसेन   राजा  का  संगी, कुन्तिभोज   था    जिनका   नाम
कोई  सन्तान  नहीं  थी  उनके, सूना बच्चे   के   बिन  धाम

शूरसेन   की     राजदुलारी, पृथा  बनी  उस   गृह  की   मोद
शूरसेन    से   कुंतिभोज ने, माँगा   उस    कन्या   को  गोद

“पृथा”   कुंति  की  बेटी  बनकर, पाई   कुंती  अपना     नाम
महल  पधारे  साधुजनों  की, सेवा  करना  नित  का    काम

एक     दिवस    आये   दुर्वासा,  सेवा   देख   दिया   वरदान
पूर्ण  मनोरथ  देव  करेंगे, जिनका  धर  लोगी  तुम   ध्यान

मन्त्र  परीक्षण   को  कुंती  ने, सूर्य  देव  को  लिया   पुकार
मंत्र   प्रभावी   था  श्रोताओं , सूर्य   देव   प्रगटे  उस    द्वार

सूर्यदेव   बोले   कुंती  से,  क्या    है  देवी   मन   की   आस
नहीं   कहोगी   तो   फिर   होगा, दुर्वासा   अरु   तेरा   नाश

सुनकर   वाणी   कुंती  बोली,  क्षमा  करें  मुझको    आहूत
सूर्यदेव    तेजस्वी    तुम   हो,   तुम       जैसा  हो  मेरे पूत

सूर्यदेव   देक र   इच्छाफल,  तुरत    हो    गए   अंतर्ध्यान
उस  वर से  अविवाहित  कुंती, ने   पाई  थी  इक  सन्तान

जग  लज्जा  में  बांध पोटली,  गंगा  में  सुत  दिया  बहाय
जिसका  रहा  राम  रखवाला,  उसको  कोई  मार  न  पाय

बहती  - बहती     लगी पोटली, गंगा  के  तट  से अब आय
धृतराष्ट्र का सारथि अधिरथ,जिधर अश्व को नीर पिलाय

दृष्टि  पड़ी अधिरथ की उस पर,देख रूप अधिरथ चकराय
कुण्डल  कवच पहनने वाला,किसने जल  में  दिया  बहाय

रूप  अलौकिक   अरु  तेजस्वी,देख  देख अधिरथ हरषाय
बिना   देर  के फिर अधिरथ ने,बालक कर में लिया उठाय

धन्यवाद   पुनि  -  पुनि  माँ गंगे, रखा  आपने  मेरा मान
पूर्ण  हुई अधिरथ  की इच्छा, मिटा  दोष  जो  निःसन्तान
UTKARSH KAVITAWALI
DAANVEER KARN


क्रमशः जारी........

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Utkarsh poetry : उत्कर्ष कवितावली

दिग्पाल छन्द : Digpal Chhand

 दिग्पाल छन्द : Digpal Chhand 


 यह मात्रिक छन्द है। 
यह  २४  मात्रिक  छन्द  है ।  चार चरण, १२/१२  मात्रा  पर  यति,  चरणान्त       गुरु
 दो - दो  पंक्ति  समतुकान्त,  इस छन्द की मापनी निम्न है- २२१,२१२२,२२१,२१२२

Example : उदाहरण 


दिगपाल छंद का विधान और उदाहरण
Digpal Chhand Ka Vidhan Or Udaharan

कनक मंजरी छन्द [ Kanak Manjari Chhand]

कनक मंजरी छन्द

 कनक मंजरी छन्द विधान :  यह वार्णिक छन्द है। 
2. गुरु का अर्थ गुरु, लघु का अर्थ लघु [ चार लघु +६ भगण (२११)+१ गुरु] =२३ वर्ण 
3. चार  चरण, सभी समतुकान्त [ मापनी  ११११,२११,२११,२११, २११,२११,२११,२ ]

Example : 

शंकर छंद [ Shanker Chhand ]

 शंकर छंद [ Shanker Chhand ] 

शंकर छंद विधान : 16/10 अंत मे गुरु लघु
क्रमशः दो - दो पंक्तियाँ समतुकांत

दीन सुदामा   की  पुकार को, सुनो     राधेश्याम
आठ पहर  जिसके अधरों पे, कृष्ण  रहता नाम
पाँच द्वार से  भीख  माँगकर, पूर्ण   करता   धर्म
कैसा  ये   प्रारब्ध  रहा    जो, दीनता   के   कर्म
- नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
shanker chhand or udaharan-utkarsh kavitawali
शंकर छंद विधान [shanker chhand ka udaharan]

Thursday, 16 May 2019

पञ्चचामर छन्द [Panchchamar Chhand]

 छन्द : पञ्चचामर 

विधान- 【 121 212 121 212 121 2】चार चरण,क्रमशः दो-दो चरण समतुकांत

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उठो  !  बढ़ो,  रुको  नहीं, करो,  मरो,  डरो नहीं
बिना      करे   तरे   नहीं,  बिना  करे नहीं कहीं
पुकारती    तुम्हे    धरा, दिखा शरीर शक्ति को
अप्राप्य प्राप्त हो,तभी,“नवीन” भोग भुक्ति को

----- नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

नहीं    कभी    अधीर हों, करें  विचार  काज पे
लिये    न  हो अशुद्धियां, लगे  न दाग आज पे
अशुध्द    भाव हो नहीं, पवित्र चित्त  जान लें
मिले    धरा  उसे जिसे , “नवीन”आप ठान लें
 नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”


बढ़े    चलो,  गढ़े  चलो, चढ़ो सुकीर्ति सीढ़ियाँ
लिखो  वही, गुने   सभी, पढें   नवीन  पीढ़ियाँ 
कभी  रखो  न  चित्त में,विकार  बैर लोभ का 
यही   प्रधान  तत्व तो, रहा  सजीव  क्षोभ का
नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

उठा   कृपाण,  वीर   जो, अधर्म   देह चीर दो 
रहे     मनुष्य  सृष्टि  पे, यथार्थ ना अधीर हो 
धरा   प्रतीक   पे  करें,  गुमान  और  देश भी 
कुमार्ग   पे  चलो   नहीं, कहें   यही  उमेश भी
नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

पञ्चचामर  छन्द

Sunday, 12 May 2019

बिहारी छंद [ Bihari Chhand ]

 छंद - बिहारी छंद [ Bihari Chhand ] 

विधान -  इसके प्रत्येक चरण में 14+8=22 मात्राएँ होती हैं , 14,8 मात्रा पर यति होती है तथा 5,6,11,12,17,18 वीं मात्रा लघु 1 होती है ।

एकाक्ष,    महाकांत,   महादेव,   भगाली
हे  ! नाथ  महाकाल  गुणोकीर्ति निराली
मैं  मूर्ख  नहीं बुध्दि, दया आप दिखाओ
है द्वार  खड़ा  दीन, प्रभो कष्ट मिटाओ

आसक्ति   शरीरी,  न हमें, राह सुझाती
है   लक्ष्य   परे  जीव   निरुद्देश्य बनाती
बैचैन   रहूँ   भक्ति बिना भाव जगाओ
अज्ञान   हरो   नाथ, कृपादृष्टि बनाओ

एकाक्ष     महाकांत   महादेव   भगाली
हे  नाथ  महाकाल  गुणोंकीर्ति निराली

है   कौन    सगा  और यहाँ कौन पराया
संदेह   यही   एक   हमें   नित्य सताया
आरंभ   तुम्ही  अंत तुम्ही काल कपाली
संसार     परे   आप  करो  नाथ कृपाली

एकाक्ष    महाकांत   महादेव   भगाली
हे नाथ महाकाल गुनीकीर्ति   निराली

- नवीन श्रोत्रिय ‛उत्कर्ष’
Utkarsh Kavitawali
Bihari Chhand : Utkarsh kavitawali

Thursday, 9 May 2019

Kundaliyan [कुण्डलियाँ]

 छंद : कुण्डलियाँ  

Chhand :Kundaliyan 

(1)
छंद    रचो   ऐसे  सभी, पढ़त   सुनत       आनंद
हिंदी     का   उत्कर्ष   हैं, हिंदी        वाले       बंध

हिंदी          वाले    बंध, शिल्प  जिनका है रोचक
गति, यति, लय हैं अंग, पढ़े   लेखक   या  पाठक
सुन     नवीन   उत्कर्ष, बसी    माटी   की  सुगंध
अद्भुत  है   यह    पद्य, शास्त्र  कहते   जिसे छंद

(2)
माया   के     पीछे  पड़े, भूले       जीवन      सार
अपनों  से  अपनें  यहाँ, कर        बैठे      तकरार
कर     बैठे       तकरार, प्रेम   का    रिश्ता   टूटा 
बढ़ी    यहाँ   तक  बात, शीश   तक  इसमें  फूटा

देख     लोभ     उत्कर्ष, मात   का  दूध  लजाया
द्वेष,  पाप,   अपमान,  साथ   लाती   है   माया
(3)
तिनका   तिनका  जोड़  खग, नीड़  बुनै  बहु बेर
को   जाने   कब  तक  रहै, को   जानै  कब   ढेर
कौ   जानै   कब  ढेर, मगर  फिर  भी  है  बुनता
हर पल  जीवन  आस, लिये  तिनका  है  चुनता
सुनो !  मित्र  उत्कर्ष, निराशा अवगुण  मन   का
आशाओं  से  जुड़ा, यहाँ   पर   तिनका   तिनका

(4)
रीते      कर   आते     सभी, रीते    ही  प्रस्थान
सब    जाने  इस  बात को, पर  देते  कब ध्यान
पर     देते   कब   ध्यान, मोह  का  जादू   ऐसा
राम    रतन   को  भूल, मूल  मानें   सब   पैसा
कहो  ! मित्र  उत्कर्ष, सभी  क्यों  धन को जीते
राम   नाम  धन  सत्य,  राम  बिन  सब है रीते
(5)

काँधे     पर    बोझा    पड़ा, चलूँ   कौनसी   चाल

सबके   मन  की  राखि  कैं, करता  रहूँ     कमाल
करता        रहूँ      कमाल, कमाई   करनी  भारी
हो    तब   ही   वह   पूर्ण, रही  जो   आस  हमारी
सुन     नवीन   “उत्कर्ष”, सभी  को  रखना  बाँधे
काज   उन्हें  यह  मिला, सबल  जिनके  थे काँधे

(6)
गर्मी    पड़ती  जोर  की, निशदिन   बढ़ता  ताप
छाँव      नही  ढूंढे मिले, उड़ता  जल  बन  भाप

उड़ता   जल बन भाप, कठिन  जीवन अब माने
वृक्ष     लगा,   क्षय  रुके, मूल्य  वृक्षो  का  जाने
सुनो     मित्र     उत्कर्ष, ओढ़ते     क्यों    बेशर्मी
अभी     हुई     शुरुआत, बाद    बाकी   है   गर्मी
(7)
करता   हित  ये   लोभ भी, जानो   भैया   आज
इसके      आते     ही    बने, अटके   सारे  काज
अटके     सारे     काज, बनाता वश  में कर मन
रसना    रस  में लिप्त, दिखा बस नैनो को धन
सुनो     !  मित्र  उत्कर्ष, इसी   से काज सँवरता
लोभ    जरूरी   आज, मूर्ख  वह जो नहि करता
(8)
गाड़ी    लाडी  और की, मन  कूँ    सदा   लुभाय 
चाहे     चोखी  आपनी, पर   मन  मानत   नाय
पर   मन  मानत नाय, नैन   औरन   कूँ  घूरत 
अरसै     सदा   नवीन, नैन अरु मन की ई लत 
धरौ     ध्यान   उत्कर्ष, आप  की  आवैं   आड़ी 
औरन     कौ   का  ओर, रहे   लाड़ी   या   गाडी
(10)
रूप    सुहाना   रात  में, दिन   में कुछ अवतार 
पत्नी     मेरी   कर   रही, मित्रो    ऐसा     प्यार 
मित्रो      ऐसा   प्यार, समझ  लीला  नहि पाया 
झाड़ू      पोछा   आज,  हसीना    ने    लगवाया 
लिखे       हाल    उत्कर्ष, बना     बेदर्द  जमाना 
मुझको    दी  क्यों  सजा, दिखाकर रूप सुहाना 

Utkarsh Kundaliyan
Utkarsh Kundaliyan Chhand


Tuesday, 7 May 2019

उत्कर्ष दोहावली [UtkarshDohawali]

 उत्कर्ष दोहावली 

 [UTKARSH DOHAWALI) 

दोहा छंद विधान : तेरह ग्यारह मात्रा भार के चार चरण प्रत्येक ग्यारहवीं मात्रा वाला वर्ण लघु , समचरण तुकांत

राधेश्याम     कृपा    करो, काटो   भव  के फंद
तबहि मजा ब्रज बास कौ, और   मिले   आंनद



गिरिधर  तेरे   ही    सभी, पत्ता,  डंठल,  मूल
मैं   केे   वश,  मेरा   कहा, गया  सत्य  मैं भूल


सब जग का पालन,किया, अपने   हाड़ निचोड़
माँ की   ममता  का  नहीं, भाव जगत  में तोड़


भावों   की   ही   भक्ति है,  भावों  के भगवान
बिना भाव सब शून्य हैं, रे ! मानस रख ध्यान


श्रद्धा   के     वश श्राद्ध हैं, भाव   लिये   तासीर
सौ  -  सौ  भोग  लगाइये, मृतक खाये न खीर


ओटक  की है लक्ष्मी, बिना  ओट  नहि   मान
ओटक  ही  उत्कर्ष हैै, ले    मूरख    ये    जान


रही  जवानी  मद  भरी, लेना   कदम  सँभाल

बाद   ढले, सँभले  नही, डुगले  तन मन चाल

मित्र   बने   हमको  हुआ, एक  वर्ष   है  आज
सच    में   तेरी   मित्रता, मेरे  सिर  का  ताज

मार्ग चुना  अच्छा  अगर, बने  एक  के  लाख
बुरे   मार्ग   खोये    सभी, हाथ लगे नहि राख

साँच  गुरू   बू   ही रहा, जो गुण - दोष बताय
बाकी सब ढोंगी  समझ, चोला  लिये    रँगाय

काम करौ सब जोर  कौ, काम  करौ  ले  जोर
काम फले फिर जोर कौ, नहीं  जोर  कौ  तोर

बुरा - भला  जैसा करो, करो कर्म , धर ध्यान
मध्य कभी रहना नहीं, मध्य   कहाँ  पहचान

ईश्वर  पर   निष्ठा  रखो, आये   नहीं   खरोंच
दाना    भी   देगा    वही, जिसने  दी यह चोंच

ज्ञान  जगत  को बाँटते, स्वयं    रहे   पर  दूर
श्रेष्ठ स्वयं को   मानते,  कैसें ?  कहौ    हुजूर

कोरी कर मत कल्पना, व्यर्थ  बजा  मत गाल
ध्यान परे रख श्वान से, चल  हाथी  की  चाल

कीकर  की   ले बाँसुरी, कृष्ण  रहे   सुर  तान
मोहित सारा जग हुआ,सुन मोहक, मृदु  गान


हार कभी नहि मानता, घर  हो  या  खलिहान
श्रम का ही मांगे  सदा, ऐसा     वीर   किसान



धूप   पड़े  गर्मी  लगे, चाहे    बहता       शीत
हलधर वीर महान तू, श्रम   से   लेता    जीत

भूख प्यास सब भूल कर, करता रहता   काम
धरती   कावो  लाल  है, हलधर जिसका नाम

बाधाओं   के  दौर  में, काम   करे   धर  धीर
पेट पीठ मिल एक है, तन     पर  नाही  चीर

बात अधूरी सार बिन, पहचानो  क्या    सार
और भले सब भूलना, लीजै      सार   समार

झूठ  फले   फूले  भले, पाता  सच  ही  जीत
करो सत्य का सामना, डरो  नहीं  तुम  मीत
सत्य क्या है  पहचानो
सत्य सूरज सम जानो

व्यंजन लघु सब जानिये, क्ष, त्र, ज्ञ को छोड़
आ, ई, ऊ, ए, दीर्घ अरु,ओ औ अं, अः  जोड़

याद  मात्रायें रखिये
बाद छंदों को रचिये

तन कूँ मन ते जोड़ि लैे, बाद  लक्ष्य  कूँ भेद
तन मन के अलगाव पै, होय  बहोतइ  खेद

राम  नाम   जपते  चलो, राम लगाये   पार
राम  सृजक,नाशक यही, पोषक  पालनहार

राम   नाम ही आदि है, राम   नाम   ही अंत
राम  नाम के जाप से, बाल्मीकि   हुए  संत

राम नाम  अनमोल है, राम   रतन   संसार
राम,  राम  का राम  है, जप   ले   बारम्बार

भाव   सभी   में  है  भरे, भावो से     गठबंध
भाव   सदा भावुक करें, भाव   बने   आनंद

भाव नही जिसके हृदय, पत्थर  मूरत मान 
भाव मूल   इंसान   की, भाव  बने पहचान

वसुधा पर निपजे सभी, कंचन पाहन   रेत
मूल्य यहाँ गुणभूत ही, चुनो मीत कर चेत

राम नाम  आराध्य का, राम,  राम का राम
फिर क्यों इसको भूलते, जप लो आठो याम


अपनी हद में तुम रहो, सुन लो यार  नवीन

सबके सब  आंती  हुए, सबके सब अब दीन


सागर सम हिरदै रखो, करो धरा सम प्यार
अम्बर के नीचे    बसा, अपना  ही  परिवार

परिश्रमी की  भोर  है, अलसाये    की  शाम
हम तो ठहरे  बीच के, भजें  राम   का  नाम

जीव ईश   के   मेल  को, कहते जीवन जान
भजन मित्र भव बीच का, भैया  देना ध्यान

प्रेम रहा नहि प्रेम अब, प्रेम    बना   व्यापार
प्रेम अगर वह प्रेम  हो, प्रेम    करे    भवपार

प्रेम संग   पेशा   मिला, हुआ बाद फिर प्यार
प्यार प्यार कर ठग रहे, अब  सारे   नर नार

महँगाई नित बढ़ रही, कैसे   लगे      विराम
आय नहीं उतनी  रही, जितने   से   हों काम

द्वेष भाव पलने लगा, नहीं   प्रेम   का नाम

लूट-मार, अपराध पर, कैसे   लगे     विराम

इधर रहो या फिर उधर, रहो   कोउ  सी पार
भँवर बीच रहना    नहीं, लोगे   काम बिगार

मिले अमीरी कुल भले, करो   नहीं    आनंद
देख भरा छत्ता, मधुप, छोड़े    कब  मकरंद


मान जीव निर्जीव का, रखो   रखें  यह मान
जो  मर्यादा    लांघता, टूटे   मन  अभिमान

बाट जोहती   प्रेमिका, पर,    प्रेमी   परदेश
विरहन रजनी छेड़ती, मन   भरके   आवेश

जब से प्रीतम हैं   गये, साधे     बैठे    मौन

सन्देश न भेजा पत्र ही, किये   न  टेलीफोन

सौतन कोई भा  गयी, या  फिर   छूटा मोह
इतना बतला दो मुझे, डसता नित्य विछोह


Contact :- +91 84 4008-4006 
                 +91 95 4989-9145
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नाम : नवीन शर्मा श्रोत्रिय
उपनाम : उत्कर्ष
पिता : श्री रमेश चंद शर्मा
माता : श्रीमति ललिता शर्मा
जन्म : 10 मई 1991
जन्म स्थान : ग्राम - नरहरपुर,तहसील- वैर,जिला - भरतपुर (राज•) 321408
वर्तमान निवास : उपखण्ड - बयाना,जिला भरतपुर (राजस्थान) 321401
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी)
सीनियर अकाउंटेंट
लेखन : गद्य-पद्य दोनों में (छंद, गीत,गजल,निबंध,कहानी,लघुकथा)
लेखन : लगभग 26 जून 2016 से
उपलब्धि : आपकी रचनाये अलग अलग राज्यो से कई पत्रिकाओं में प्रकाशित,
काव्य मंच : 1. उज्जैन, 2. अपनाघर आश्रम, 3. बयाना

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