Tuesday, 28 February 2017

छंद : आल्हा/वीर (Aalha/Veer)

सुमिरू तुमको हंसवाहिनी,मनमोहन,गुरुवर, गिरिराज ।


पंचदेव,  गृहदेव,  इष्ट  जी,मंगल  करना   सारे  काज ।।
बाल नवीन करे विनती यह,रखना   देवो   मेरी   लाज ।
उर भीतर के भाव लिखूँ मैं,आल्हा छंद  संग ले आज ।।
देश,वेश,परिवेश बदल दो,सोच बिना कछु नही सुहाय ।
मधुर बोल मन  प्यारे होते,देते   वह   सब  को  हर्षाय ।।


मन पीड़ा  है मन से भारी,मनन करो मारग मिल जाय ।
आत्म बोध चिंतन से मिलता,जो करते वह लेते  पाय ।।
क्षणिक  सुंदरी  काया माया,डाले बैठी भ्रम  का जाल ।
जो  इनके  पाशे  में  पड़ते,उनका  अंत बुरा  ही हाल ।।
आशय क्या जीवन का समझो,जो तुमको है सुख की चाह ।
राम  नाम  धन  साँचो  जग  में,ध्यान  धरे  तर  जाता काह ।।
दया  धर्म  मन के  आभूषण,धारे  मन सुंदर हो जाय ।
यश  समृध्दि  मान  बढ़े अरु,अंत ईश को  लेता पाय ।।
नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
श्रोत्रिय निवास बयाना

Friday, 24 February 2017

एक सुंदरी : श्रृंगार रस

छंद : मत्तग्यन्द सवैया
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जोगिन एक मिली जिसने चित,
चैन चुराय  लिया चुप  मेरा ।

नैन  बसी  वह   नित्य  सतावत,
सोमत  जागत डारिहु  घेरा ।

धाम कहाँ उसका  नहिं  जानत,
ग्राम, पुरा, बृज माहिंउ हेरा ।

कौन  उपाय करूँ  जिससे वह,
मित्र  करे  अब आकर भेरा ।।

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Thursday, 23 February 2017

संयोग श्रृंगार : मत्तग्यन्द सवैया

छंद : मत्तग्यन्द सवैया
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नैनन   ते   मद  बाण  चला,
             मन भेद गयी  इक नारि निगोरी ।

राज किया जिसने  दिल पे,
             वह  सूरत  से  लगती बहु भोरी ।

चैन गयो फिर  खोय  कहीँ,
             सुधि बाद रही हमकूँ कब थोरी ।

प्रेम  करो   हमने   जिससे,
             मन मेल हुओ वह चाँद चकोरी ।।

नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
श्रोत्रिय निवास बयाना
+91 84 4008-4006

Wednesday, 22 February 2017

मरुभूमि और महाराणा [ Marubhoomi Or Maharana ]

★★मरुभूमि और महाराणा★★

पंद्रह    सौ   चालीसवाँ, कुम्भल राजस्थान
जन्म हुआ परताप का, जो  माटी  की शान


माता जीवत कँवर औ, तात उदय था नाम
पाकर  ऐसे   वीर  को, धन्य हुआ यह धाम


पन्दरा सौ अड़सठ  से, सत्तानवे  के  बीच
अपने ओज प्रताप  से, मेवाड़   दिया  सींच


हल्दीघाटी   युध्द  में, चेतक   हुए    सवार
महाराणा  प्रताप  को, छोड़ा     नाले    पार


ज्येष्ठ शुक्ला तीसरी, पूजे       राजस्थान
महाराणा प्रताप का, जन्म विकरमी जान


महाराणा कि  वीरता, देख   मुगल  थे दंग
ओजस्वी  परताप था, नीले   चेतक   संग


इब्राहीम लिंकन लिखा,जब वह अपना लेख
छाती चौड़ी हो गयी,  ओज  वीर     का  देख


लिंकन  बोले  मात   से, में  हूँ  राजस्थान
क्या लाऊ माता बता, धरा गुणों की खान


माता बोली कुछ यूं, सुन लिंकन यह आप
वीर धरा वो पावनी, जहाँ   हुआ   परताप


थोड़ी सी तुम रेत को,लाओ   अपने     साथ
वीर धरा को नमन करुँ,फेर झुका कर माथ


वीर धरा के वीर को, देख   युद्ध   में  वार
एक बेर में  मार  दे, घोडा    और   सवार


कवच भाला ढाल सभी, हुए पाँच मन पार
लाद वजन वो वीर ये , तब करता था वार


महाराणा कि ओर से,सैनिक बीस हज़ार
जा भिड़े सभी फौज से,करे  वार  पे  वार


हल्दी घाटी युध्द में,सैनिक बीस   हज़ार
हज़ार पिच्यासी लड़े,दिया सभी को मार

ज्येष्ठ शुक्ला तीसरी,जन्मा  वीर   प्रताप
चाँद रूप मुखड़ा लिए,ओज भरा ज्यो ताप


हल्दी घाटी युध्द में,सैनिक बीस हज़ार
जा भिड़े सभी फ़ौज से,करे वार पर वार


मातृभूमि   के  प्रेम  में,खायी  उसने  घास
छोड़ दिया घरवार सब,छोड़ा निज आवास


महाराणा के कोप से,अकबर सो नही पाय
नींदों में लगता उसे,वीर मार   नहि  जाय


पांच मन का भार लद,लड़े युध्द वह वीर
एक  बेर  के  वार   से, सीना   देता   चीर


वीर धरा  का  लाल  था,सबसे  बड़ा था मान
शीश झुका सकता नही,वीर वह स्वाभिमान

विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित

JAI VIJAY-MUMBAI
SHESHAMRUT- HATHRAS
JAI VIJAY-MUMBAI
VARTMAN ANKUR - DELHI
RAJASTHAN PATRIKA-BAYANA
DAINIK POORVODAY- GUVAHATI



उत्कर्ष कवितावली : 05

जय शिव शम्भू


महाशिव रात्रि आई,सब शिवालय सजे है,

कालो के  काल,महाकाल कैलाश चढे है,

घूँट लो भंगिया,बाबा नांदिया,कहने लगे है

इस पावन पर्व के रस में सब बहने लगे है,

महाशिवरात्रि के पर्व की अग्रिम शुभकामनाये

           नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

हिंदी और मेरे विचार [Hindi Kya Hai]

 हिंदी और मेरे विचार [Hindi Kya Hai]

हिंदी और मेरे विचार

हिंदी भाषा यह वो भाषा है जो हिन्दुओ के द्वारा बोलचाल और विचारों के आदान प्रदान के लिए सहज और वैज्ञानिक मानदंडों के आधार पर  विकसित की गयी थी,यह सम्पूर्ण हिंदुस्तान की भाषा रही है । सनातन काल में संस्कृत भाषा विशेष रूप से प्रचलित थी परंतु यह भाषा अपने जटिल रूप के कारण अपना अस्तित्व खोती रही,और लोगो के आपसी विचारो के आदान प्रदान में दिक्कत आने लगी,लोग देशी भाषा जो एक क्षेत्र विशेष की भाषा होती थी उसका प्रयोग अत्यधिक तौर पर करने लगे,ऐसे में बिचारो के आदान प्रदान के लिए नई भाषा की जरूरत पड़ने लगी,कुछ विद्वानों के सहयोग से हिंदी भाषा का जन्म हुआ और इसकी लिपि देवनागरी विकसित की गयी जो मूलतः देवनगर के आसपास की भाषा मानी गयी है । यह भाषा अपने सरल और सुंदर बोलचाल के लिये सम्पूर्ण हिंदुस्तान में पहचान पा गयी । चूंकि अधिक क्षेत्रो में प्रयोग के कारण और हिंदुस्तान के सभी देशी भाषाओ से तालमेल होने के कारण यह हिंदी  के नाम से जानी जाने लगी ।

हिंदी साहित्य का उत्थान
हिंदी भाषा का समय समय क्षय हुआ लेकिन तुलसी,चंद्रवरदाई,सूरदास,कबीर,रसखान,रहीम,आदि कवियों के प्रसिद्द ग्रंथो ने इसका पुनरोत्थान किया । चूंकि इनके द्वारा रचित लेख,ग्रन्थ धार्मिक सामाजिक भावनाओ से भरे हुए थे, और इनकी भाषा शैली सुपाच्य, बोधगम्य,और मधुरता पूर्ण थी, लोगो को पढ़ने में,सुनने में,आनंद आने लगा और हिंदी भाषा एक बार फिर सम्पूर्ण जगत के पटल पर प्रमुख भाष के रूप में उभर कर आई । हिंदुस्तान में विदेशी आक्रांताओं आना जाना लगा रहा अतएव हिंदी भाषा में कुछेक शब्द अन्य भाषाओं (उनकी भाषाओ) के प्रयुक्त किये जाने लगे उनमे मुख्यतः उर्दू और अंग्रेजी प्रमुख है । वैसे यह भाषा विदेशियो के लिए चुनौती पूर्ण रही है । उनको हमे समझने के लिए काफी मसक्कत करनी पड़ी है ।

आधुनिक हिंदी भाषा
आज हिंदी भाषा पर फिर से वही संकट आ खड़ा हुआ है जिसका प्रमुख कारण हमारा अन्य भाषाओं के प्रति आकर्षण रहा है । आज हिंदुस्तान में हिंदी का उपयोग अंग्रेजी भाषा से कहि कम मालुम जान पड़ता है । यह सब पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव है । भारतीय संस्कृति का क्षरण हो रहा है । जिसके कारण भाषा भी अपना वर्चस्व खो रही है । और इसके लिए हिंदी पत्र व्यवहार,हिंदी साहित्यिक ग्रन्थ,आदि की जरूरत आन पड़ी है । जो लोगो के चेतन पटल पर अपना अधिपत्य स्थापित करें । जबकि सत्यता यह है की हम हिंदी भाषा में विचारो का आदान प्रदान द्रुत गति से कर सकते है ।  यह विश्व की एक मात्र ऐसी भाषा है जिसमें प्रत्येक के लिए अलग से शब्द नियुक्त है । यह भाषा बोलचाल की दृष्टि से और वैज्ञानिक दृष्टि से हमारे लिए वरदान है । इस भाषा के द्वारा हमारे कंठ,जिह्वया,आदि का व्यायाम भी हो जाता है जिसके कारण मुख और गले संबंधी बीमारियों  का अकारण भय नही रहता । जैसा की कहा गया है । "पहला सुख निरोगी काया" काया को निरोगी रखने के लिए व्यायाम की जरूरत होती है फिर इस बात से हम खुद को कब तक नकारते रहेंगे ।

एक पहल
हिंदी भाषा को आज आधुनिक युग में प्रमुख भाषा के रूप में पुनः उभारने के लिए हम सभी को एकजुट होकर कुछ संकल्प लेने होंगे । जैसे- हिंदी में पत्र व्यवहार करना, हिंदी भाषी पत्रकाओ का वाचन पठन करना, हिंदी कीे तमाम पाठशालाओ को बढ़ावा देकर अन्य भाषाओ को न के बराबर उपयोग में लेकर,हिंदी भाषा में पुनः नये धर्म ग्रंथ और आलेख लिख कर । आओ हम अपने पुरखों की विरासत इस सुरक्षित,कसरतकारी,मधुर भाषा की पुनः सम्पूर्ण विश्व में विजय पताका फ़हरावे । अंत में कुछ पंक्तियाँ सप्रेम आप सभी को समर्पित....

हिंदी भाषा हिन्द की,करे जगत कल्यान ।
मुख मत मोड़े बाबरे,यह पुरखो का मान ।।

✍नवीन श्रोत्रिय "उत्कर्ष"
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Monday, 20 February 2017

गीत : इंतज़ार

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
भीग रही है पलके मेरी सजन तेरी याद में,
बैठी हूँ तन्हा अकेली तेरे इंतज़ार में,
तू दूर गया तो तेरे में पास आ गयी- 2
क्या हाल है हमारा देख तेरे प्यार में,
क्या हाल है हमरा सजन तेरे प्यार में
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••
तूने बुलाया मिलने में सब छोड़ आ रही,
लोक लाज भूली,रीति तोड़ आ रही
घर से हूँ निकली करके सिंगार में,
क्या हाल है हमारा देख तेरे प्यार में
क्या हाल है हमारा सजन तेरे प्यार में
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
खुद से ही खुद में बात कर रही,
तुझमे जी रही और तुझमे मर रही,
क्यों चोट लगाई तूने मेरे ऐतबार में
आया नही तू मिलने,क्यों मौसम बहार में
क्या हाल है हमारा देख तेरे प्यार में,
क्या हाल है हमारा सजन तेरे प्यार में
------------------------------------------------
       ✍नवीन श्रोत्रिय"उत्कर्ष"©
       +91 84 4008-4006

श्रृंगारिक कविता

एक सुन्दर सी नार,वाको रूपहु निखार । 
जाके लाल लाल होट, नयन  कटारि   है ।।
बोले हँस हँस बोल,मन मेरो जाय डोल ।
है गोल गोल कपोल,सूरत  की  प्यारि है ।।
मनभावन है बोली,और एकदम भोली ।
लागे अप्सरा हो जैसे,वो सबसे न्यारि है ।।
लगा नैनो में कजरा,सज़ा बालों में गजरा ।
देखे सारेहु औ जब,निकरे    बाहरि   है ।।
रहे कछु बतियाय, दुल्हन मेरी हो जाय ।
देख विधाता ने कैसी,मूरत   संवारि   है ।।
देखि मैनेहु जबते, भयो दीवानो तबते ।
सुधबुध खोई मैंने, नीदहु   बिसारि    है ।।
✍नवीन श्रोत्रिय “Utkarsh”

होली : कविता

🔸🔹होली🔹🔸

बज रहे चंग,
भर मन में उमंग,
नर नारी संग संग,
देखो फाग आज खेल रहे,

कान्हा डार रहो रंग,
ले के ग्वाल बाल संग,
वो तो करे हुड़दंग,
देखो एक दूजे पे उड़ेल रहे,

डारो राधाहु पे रंग,
रंग दीनो अंग अंग,
देख बृजवासी भये दंग,
ऐसे जुगल को सदा हु मेल रहे ।

बरसे पहले से ही रंग,
कोउ में नाय अब ढंग,
ये  देख नवीन है दंग,
कैसे होरी को है झेल रहे ।।

✍नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
  +9184 4008-4006

Vivah Vidai Geet : विदाई गीत

 Vivah Vidai Geet : विदाई गीत 

लाडी  आई  सासरिये ,भर   नैनं   में आस
चाहत बनू सबकी में,मेरा प्रेमी हो भरतार
लाडी आई सासारिये ,ओ भर नैनं ......

ओ लाडी आई सासारिये......
मईया छोड़ी मैंने ,अब बाबुल भी छोड़ा,
पिया के घर से अब नाता जोड़ा,
में आई छोड़ छाड़ ,सब घर द्वार..
लाडी आई सासारिये,हो भर नयनं में आस

लाडी आई सासरिये,भर नैनम् में आस,
पिया के घर पे वो सब मिल जावे,
मोहे पीहर की कभी न याद सतावे,
ससुर मिले मोय पिता के जैसो,
मईया जैसी हो मेरी सास,
लाडी आई सासारिये,वो तो भर नैनं में आस,

ओ लाडी आई सासरिये, ओ भर नैनं में आस,
भाई छोड़ आई,बहिना छोड़ आई,
बचपन से रिश्ता तोड़ आई,
आई छोड़ सहेलियो का प्यार,
ओ लाडी आई सासारिये, भर नयन में आस,

मिले जेठानी मेरी बन के सहेली,
रहूँ न में कबहू अकेली,
मिले भाई जैसा नटखट देवर,
बहिना जैसी करे ननद दुलार,
लाडी आई सासरिये, ये भर नयनन में आस,

ओ लाडी आई सासारिये, हो भर नयन में आस...
    - नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
      श्रोत्रिय निवास बयाना
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Vivah Vidai Geet : विदाई गीत

Sunday, 19 February 2017

सच्चा प्रेम [True Love]

 !! सच्चा प्रेम [True Love] !! 

पिता की डाँट फटकार को सबहि उनकी नाराजगी समझते है,उनका गुस्सा समझते है, पर  एक  पिता का हृदय समझ से परे होता है,वह एक नारियल की भांति होता है, बाहर से सख्त और अंदर से कोमल, यह बात पहले मेरी समझ से भी बाहर थी,परंतु जब यथार्थ से परिचय हुआ तो,में भी सन्न रह गया,पिता होता ही ऐसा है, वह बच्चे के भविष्य का ध्यान रखते हुए ऐसा रुख अपनाता है । बात पिछले कुछ दिनों की है, पिताजीमुम्बई जाने की तैयारी करने लगे, पहली बार शहर से दूर जा रहे थे, मन विचलित था, कैसे इतने बड़े शहर में रहेंगे पहली बार घर से दूर  जा रहे है, सीधे स्वभाव के है अनजान शहर है । आजकल लूटपाट,चोरी जैसे घटनाएं इन बड़े शहरो  में सामान्य बन कर रह गयी है ।  मेरे मन में अनहोनी की शंका जन्म ले रही थी, मन भी आशंकित था,आखिर कैसे ये ट्रेन का सफ़र  अकेले कर पाएंगे । आज तक तो सिर्फ घर से ऑफिस तक रहे है,फिर  भी मन मारकर उनका सामन पेक करवाने में लगा रहा, सारा सामान पेक हो गया,बस घर से निकलने की तैयारी करने लगा, शाम को 10 बजे की ट्रेन थी,नौ बज चुके चुके थे,मन पर बोझा रख उनको साथ लेकर स्टेशन की तरफ चल दिया, स्टेशन पर पहुँच कर बार बार उनको समझा रहा था, फोन चालु रखना, किसी अनजान व्यक्ति का दिया हुआ खाना मत खाना, और स्टेशन पर उतर कर,फोन कर लेना, वहां हर तरह के लोग रहते है,किसी की बातो में मत आना, आजकल लोग स्वार्थी है,आप घर जाने के लिए टैक्सी किराए पर ले लेना, ट्रेन के चक्कर में न पड़े,बहुत भीड़ जाती है । आप उसमे नही बैठ पाओगे,तभी ट्रेन का अनाउंस हुआ, ट्रेन आने वाली है, मन चिन्ताओ से घिर गया,धड़कन तीव्र चलने लगी, साँस अवरुधित होने लगी, ट्रेन आ गयी प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की भीड़ बहुत अधिक थी । जब यही ऐसा हाल है तो आगे न जाने कैसा हाल होगा,ट्रेन के गेट पर मत खड़े होना,अधिक है । किसी की चिकनी चुपड़ी बातो में मत आना पिताजी  को कहते हुए ट्रेन में सामान रखने लगा, पिताजी गुस्से से बोले मुझे मत सीखा,तूने मुझे बड़ा नही किया है । बल्कि मैंने तुझे बड़ा किया है । उनका गुस्सा में अपने में प्यार लिए हुए था । अब पिताजी ट्रेन में बैठ चुके थे । ट्रेन का हॉर्न बजने लगा, कंठ भर आया,आँखों से पानी झरने लगा, इधर पिताजी भी मुझे देख कर उदास हो गए,उस दिन मुझे कही लगा,की मैं आजतक जिनकी डाँट फटकार को,उनकी नाराजगी समझ रहा था,असल में वह उनका प्रेम है ।

✍नवीन श्रोत्रिय "उत्कर्ष"©
   श्रोत्रिय निवास बयाना

Utkarsh Kahaniyan
True Love

Saturday, 18 February 2017

शोकहर/ सुभांगी छंद [shokhar subhangi chhand]

शोकहर/ सुभांगी छंद 

[shokhar subhangi  chhand]

विधान : - [8,8,8,6 मात्राओं पर यति,पहली दूसरी यति अंत 
तुकान्त,चार चरण समतुकांत]
सुनो    दिवानी,राधा      रानी,बृषभानु    लली, रख    प्रीती ।
क्षोभ  सतावे,चैन    न   आवे,दिल    ही    जाने,जो    बीती ।
यह सब साँचो,आँखिन बांचो,नहि  कुटिल  कोउ,यह   नीती ।
त्याग  उदासी,आँखे   प्यासी,कान्हा  को  दिल,तुम   जीती ।
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नाम : नवीन शर्मा श्रोत्रिय
उपनाम : उत्कर्ष
पिता : श्री रमेश चंद शर्मा
माता : श्रीमति ललिता शर्मा
जन्म : 10 मई 1991
जन्म स्थान : ग्राम - नरहरपुर,तहसील- वैर,जिला - भरतपुर (राज•) 321408
वर्तमान निवास : उपखण्ड - बयाना,जिला भरतपुर (राजस्थान) 321401
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी)
सीनियर अकाउंटेंट
लेखन : गद्य-पद्य दोनों में (छंद, गीत,गजल,निबंध,कहानी,लघुकथा)
लेखन : लगभग 26 जून 2016 से
उपलब्धि : आपकी रचनाये अलग अलग राज्यो से कई पत्रिकाओं में प्रकाशित,
काव्य मंच : 1. उज्जैन, 2. अपनाघर आश्रम, 3. बयाना

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Krishna Bhajan कृष्ण भजन

कृष्ण भजन  Krishna Bhajan उनसों  का  प्रीत  रखें, जिन प्रीत  काम की करनी तो  उनते,करें, मुक्ति भव  धाम की घर ते  चले जो आज, मिल...

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